कांग्रेस अधिवेशन 1916 के अध्यक्ष कौन थे ?

पहले कॉग्रेस अधिवेशन जो की 1885 में हुआ था से लेकर 1940 तक हर वर्ष आयोजित किये जाते थे हर वर्ष किसी विद्वान और प्रतिष्ठित व्यक्ति को इन अधिवेशनों का अध्यक्ष चुना जाता था । सूरत अधिवेशन के पश्चात को कांग्रेस दो टुकड़ों में विभक्त हो गयी थी पहला था गरम दल और दूसरा नरम दल । जिससे भारतीय स्वतंत्रता के आंदोलन काफी हद तक कमजोर हो गए थे।

1916 congress adhiveshan adhyaksh

1915 में गोपालकृष्ण गोखले और फिरोजशाह मेहता की मृत्यु हो गयी । यह दोनों उग्रवादियों के कट्टर विरोधी थी इनकी उपस्थिति के कारण ही कांग्रेस का विभाजन हुआ था । 1915 में इन दोनों की मृत्यु के बाद उग्रवादियों के कांग्रेस में पुनः विलय के दरबाजे खुल गए ।

गरम दल और नरम दल दोनों को एक करने के लिए बालगंगाधर तिलक और एनी बेसेंट ने प्रयास किया और यह प्रयास ही कांग्रेस अधिवेशन का मुख्य लक्ष्य था इसी के लिए ही कांग्रेस अधिवेशन 1916 का आयोजन अम्बिकाचरण मजूमदार की अध्यक्षता में किया गया था ।

अम्बिकाचरण मजूमदार कांग्रेस अधिवेशन 1916 के अध्यक्ष थे इसी अधिवेशन को लखनऊ समझौता और अंग्रेजों की भाषा में लखनऊ पैक्ट के नाम से जाना जाता है।

इस अधिवेशन में कांग्रेस की एकता और हिन्दू मुस्लिम एकता को प्रमुख रूप से केंद्रित किया गया । मुस्लिम नेता जिन्ना मुसलमानों के हक में साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व की मांग कर रहे थे जिसे की कांग्रेस द्वारा मान लिया गया ।

जिन्ना की मांग को मानना बहुत ही भयानक और राष्ट्र के लिये हानिकारक साबित हुआ । कुछ लोग इसे ही भारत के विभाजन और पाकिस्तान के उदय के लिए जिम्मेदार मानते हैं । इसे लखनऊ अधिवेशन का काला दिन औए काला कांग्रेस अधिवेशन भी कहा जाता है

मदनमोहन मालवीय जैसे बड़े नेता भी इस समझौते के विरोध में थे उनका मानना था की यह समझौता मुस्लिम लीग को बहुत ही महत्व या तवज्जो देता है । उनका मानना था की भारत में हिन्दू बहुल हैं और भारत को हिन्दू राष्ट्र ही होना चहिये जिसमे मुस्लिम अल्पसंख्यक रहें और उन्हें भी हिन्दुओं जैसे सभी अधिकार मिले ।

पर जिन्ना का मानना था की अगर अंग्रेज हिंदुओं के हाथ सत्ता देते हैं तो भारत हिन्दू राष्ट्र होगा और मुसलमानों को हिंदुओं के अधीन रहना पड़ेगा इसलिए अंग्रेज़ ही भारत का विभाजन करके पाकिस्तान का निर्माण करें ।

भारत 1947 के पहले पाकिस्तान से लेकर म्यामार तक फैला हुआ था जिन्ना की मांग को देखते हुए अंग्रेजों ने भारत के 6 टुकड़े कर दिए जिसके निर्माण स्वरूप नेपाल भूटान पाकिस्तान से लेकर म्यामार का जन्म हुआ । इन विभाजन को भारत विभाजन के संविधानिक रूप में सम्मिलित नहीं किया गया । सिर्फ भारत पाकिस्तान के विभाजन को शामिल किया गया ।

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